GREAT KUSHWAHA: THE RAVA RAJPUT

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The Rava (or Rawa) Rajput is a sub-group of the Indian Rajput clan also categorized as high cast rajputs as its members claim descendancy from different ancestors and dynasties. and are associated with another 6 of the 36 Rajput clans: the Gahlot,Kushwaha, Tanwar, Yadu, Chauhan and Panwar. Most members add the title Singh & Verma to their surname; others who belong to Tanwar clans of the Chandar Vans, identify themselves with the names Tanvar, or Mogha. The clan also subdivides into castes on the basis of social acceptance.रवा राजपूत में सामिल छ राजवंश तथा उनकी शाखाऐं
1. आदिकालीन वंश- सूर्यवंश से उत्‍पन्‍न दो राजवंश गहलोत तथा कुशवाहागहलोत राजवंश का आदिकालिन गोत्र वैशम्‍पायन है तथा कुशवाहा राजवंश का आदिकालीन गोत्र मानव/मनू है2. आदिकालीन वंश- चंद्रवंश से उत्‍पन्‍न दो राजवंश तॅवर तथा यदुवंशतॅवर राजवंश का आदिकालिन गोत्र व्‍यास है तथा यदु राजवंश का आदिकालीन गोत्र अत्रि है3. आदिकालीन वंश- अग्निवंश से उत्‍पन्‍न दो राजवंश चौहान तथा पंवारचौहान राजवंश का आदिकालिन गोत्र वत्‍स/वक्‍च्हस है तथा पॅवार राजवंश का आदिकालीन गोत्र वशिष्‍ठ है

उपरोक्‍त राजवंशो को बाद में आवश्‍यकता अनुसार कुछ शाखाओं में विभाजित किया गया था जिनका गोत्र के रूप में प्रयोग होने लगा है

गहलोतवश:- गहलोत, अहाड, बालियान, व ढाकियान

कुशवाहावंश:- कुशवाहा, देशवाल, कौशिक व करकछ

तॅवरवंश:- तंवर, सूरयाण, भरभानिया, माल्‍हयाण, सूमाल, बहुए, रोझे, रोलियान, चौवियान, खोसे, छनकटे, चौधरान, ठकुरान, पाथरान, गंधर्व, कटोच, बीबे, पांडू, झब्‍बे, झपाल, संसारिया व कपासिया

यदुवंश:- यदु, पातलान, खारीया/ इन्‍दारिया, छोकर, व माहियान

चौहानवंश:- चौहान, खारी या खैर, चंचल, कटारिया, बूढियान, बाडियान या बाढियान,गरूड या गरेड, कन्‍हैडा या कान्‍हड, धारिया, दाहिवाल, गांगियान, सहचरान व माकल या माकड या भाकड या बाकड

पंवार वंश:- पंवार, टोंडक, वाशिष्‍ठान, ओजलान, डाहरिया, उदियान या उडियान, किरणपाल व भतेडे

उपरोक्‍त सभी वस्‍तुत: छ राजवशों की शाखाऐं है परन्‍तू अव वैवाहिक सुविधा के कारण इनका प्रयोग गोत्र के रूप में भी किया जाता है

रवा राजपूतों मूल निवास स्‍थान
गहलोत वंशी रवा राजपूतों का निकास गुजरात के बल्‍लभीपुर से है। इनके मूल ठिकाने चितौड तथा अहाड प्रदेश रहे है

कुशवाहा वंशी रवा राजपूतों के मूल ठिकाने राजस्‍थान के राजौर, आमेर व अमरसर थे। ये अपने वर्तमान ठिकाने से पहले पंजाब के नरवरगढ भी रहे थे।

तॅवर वंशी रवा राजपूतों का निकास इन्‍द्रप्रस्‍थ व चंबल क्षेत्र से है। इनके मूल ठिकाने दिल्‍ली में नारायणगढ, मक्‍सूदाबाद, ज्‍वालाहेडी, अनंगपुर (वर्तमान महरौली), सढौरा खुर्द, संढौरा कलां, हरि‍याणा में गोपालगढ त‍था राजस्‍थान में पाटन व तारागढ रहे हैं।

यदु वंशी रवा राजपूतों का निकास मथुरा से है। राजस्‍थान के भदानक प्रदेश में विजय मन्दिर बयाना इनका मूल ठिकाना है।

पंवार वंशी रवा राजपूतों का निकास राजस्‍थान में आबूपर्वत के पास अचलगढ से है तथा मूल ठिकाना मध्‍यप्रदेश में धारा नगरी, राजस्‍‍थान में कलानौर, तानतपुर व चन्‍दावती तथा हरियाणे में सावड रहे है।

चौहान वंशी रवा राजपूतों का निकास राजस्‍थान के साम्‍भर प्रदेश से है। इनके मूल ठिकाने राजस्‍थान में शाकम्‍भरी झील, अजमेर, धोलकोट, नीमराणा व हर्षनाथ रहे हैं।
457 वर्षों (सन 736 से 1193 ई.) तक दिल्‍ली पर तवंर वंशीय राजपूत राजाओं का आधिपत्‍य था। सम्राट कुमारपाल देव तंवर (सन् 1021-1051) ने राष्‍ट्र-सुरक्षा के लिए संघीय प्रणाली के अंतर्गत चर्तुथ राजपूत संघ का गठन किया था। इससे पूर्व भी तीन बार एसे संघ बने थे जो खास सफल नही रहे। यह वर्तमान में मौजूद नाटो संगठन जैसा था जिसका उद्देश्‍य बाहरी अथवा आंतरिक आक्रमण के समय सभी राजपूतों को संगठीत रखना था।

इस फौजी संगठन का नाम “राजपूत वाहिनी दल” था। “राजपूत वाहिनी दल-रावाद” की प्रतिष्‍ठा एवं शोर्य के कारण इस संगठन में सम्मिलित सभी राजपूत-सैनिक, सामन्‍त, भूनाथ, जागीरदार व उनके सम्‍बंधी अपने को “रावाद” कहलाने में गौरव अनुभव करते थे। यह रावाद कालांतर में रवा बन गया, जो इन राजपूतों का विशेषण है। अब ये समस्‍त क्षत्रिय समाज में रवा राजपूत के
नाम से जाने जाते हैं।

रावाद में राजपूतों के 36 कुलों में से केवल 6 कुल- तंवर, चौहान, पंवार,
यदु, कछवाहे तथा गहलौत ही सम्मिलित है। वस्‍तुत: इन 6 कुली राजपूतों ने
साहसिक प्रयास, सामयिक सूझबूझ तथा कूटनितिक प्रबन्‍धों से राष्‍ट्र की
संघीय सुरक्षा प्रणाली के आधार पर गठित राजपूत वाहिनी दल (रावाद) नामक
राजपूत संघ द्वारा देश की रक्षा की थी।

रवा जाति
रवा शब्‍द न जातिवचक है और न स्‍थानवाचक। इसका सम्‍बंध चतुर्थ राजपूत संघ, रावाद यानि राजपूत वाहिनी दल, से है। रावाद का गठन दिल्‍ली सम्राट कुमारपाल देव तंवर (सन् 1021-1051) ने किया था। रवा उन राजपूतों का विशेषण है जो चतुर्थ राजपूत संघ के सदस्‍य थे। अब समस्‍त क्षत्रिय समाज में इन्‍हे रवा राजपूत नाम से जाना जाता है। रावाद में राजपूतों के छत्‍तीस कुलों में से छ: कुल ( तंवर, चौहान, पंवार, यदू, कछवाहा तथा गहलौत) ही सम्मिलित हैं। दिल्‍ली तथा आसपास रवा राजपूतों के अनेक गांव तथा बस्तियॉ हैं।

रवा शब्‍द रावाद का अभ्रशं है। रावाद यानि राजपूत वाहिनी दल राजपूतों का
एक फौजी संगठन था। इस संघीय सेना के गौरव-वैभव के कारण इसके सदस्‍य रावाद
कहलाने में गौरव का अनुभव करते थे। इस प्रकार राजपूतों के एक नए वर्ग या
शाखा का जन्‍म हुआ जिसे रावाद या रवा राजपूत कहते हैं। आज रवा राजपूत
कहलाने वाले राजपूतों के पूर्वज राजपूत वाहिनी दल के सदस्‍य थे। समय के
साथ, रणक्षेत्र में शत्रुओं को धरती दिखाने वाले ये रणबांकुरे आज स्‍वयं
कृषि कार्य में संलग्‍न धरती देखने वाले बन गए हैं। कृषि कार्यो में आज
इनका कोई सानी नही। आठ सौ वर्षों के लम्‍बे अन्‍तराल में अपने ही धक्‍कों
से बनते बिगडते ये रवा राजपूत अपनी आन बान शान और संस्‍कृति को बनाए हुए
हैं। यह एक गौरव की बात

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The Rava (or Rawa) Rajput is a sub-group of the Indian Rajput clan also categorized as high cast raj…

2 COMMENTS

  1. Yes Rawa group of Kshatriya mixed.during mughal it was made in western part of india Kushwaha have sepate identity under this group as Suryavanshi.If we talk about Kshyap (Kachhap) He was the great king & rishi (sage) in his decendent was manu(manvya) so we can say either Kshyap or Manu gotra.I am realy happy to see the efforts of Kushwaha Kshatriya brother